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कर्म करो, फल की चिंता मत करो। - करियर में असफलता से कैसे निपटें

कर्म करो, फल की चिंता मत करो - करियर में असफलता से कैसे निपटें-


हमारे देश में करियर सिर्फ नौकरी नहीं होता,

वो इज़्ज़त, पहचान, और घरवालों की उम्मीद भी होता है।
यही वजह है कि जब करियर में असफलता आती है, तो दर्द सिर्फ जेब में नहीं,
सीधे दिल और दिमाग में उतर जाता है।

किसी का एग्ज़ाम छूट जाता है,
किसी का इंटरव्यू खराब हो जाता है,
किसी को नौकरी से निकाल दिया जाता है।

और फिर शुरू होती है वो लाइनें —
“अब क्या करेगा?”
“इतनी पढ़ाई का क्या फ़ायदा?”
“लोग क्या कहेंगे?”

असफलता सिर्फ रिज़ल्ट नहीं होती

गाँव-कस्बों से लेकर बड़े शहरों तक,
हम सबने ये देखा है कि मेहनत करने के बाद भी
जब रिज़ल्ट हाथ में नहीं आता, तो आदमी खुद पर शक करने लगता है।

रात को नींद नहीं आती।
मोबाइल खोलो तो सब सफल दिखते हैं।
किसी का पोस्ट — “Selected”
किसी का — “Promotion”

और हम अपने आप से पूछते हैं —
“मेरे साथ ही ऐसा क्यों?”

यही वो समय होता है जब मन सबसे ज़्यादा टूटता है।

गीता की सबसे बड़ी सीख

ऐसे ही समय में भगवद गीता हमें एक सीधी-सपाट बात कहती है:

कर्म करो, फल छोड़ दो।

सुनने में आसान लगता है,
लेकिन करने में सबसे मुश्किल।

कृष्ण अर्जुन से ये नहीं कहते कि
“मेहनत मत करो”
या
“रिज़ल्ट की परवाह मत करो”

वो बस इतना कहते हैं —
मेहनत तुम्हारे हाथ में है,
रिज़ल्ट नहीं।

करियर में इसका मतलब क्या है?

आज के समय में करियर कुछ ऐसा बन गया है:

  • एक एग्ज़ाम = ज़िंदगी
  • एक इंटरव्यू = इज़्ज़त
  • एक रिज़ल्ट = आत्मसम्मान

लेकिन सच्चाई ये है कि:
एक रिज़ल्ट तुम्हारी काबिलियत तय नहीं करता

तुमने तैयारी की — वो तुम्हारा कर्म था।
पेपर कैसा आया — वो तुम्हारे हाथ में नहीं।
कट-ऑफ कहाँ गया — वो तुम्हारे हाथ में नहीं।

फिर भी हम खुद को दोष देते हैं।

देसी घरों की सच्चाई

हमारे देसी घरों में एक चीज़ बहुत common है —
तुलना।

“फलाँ का लड़का देखो…”
“उसकी तो नौकरी लग गई…”
“तू कब तक ऐसे ही रहेगा?”

ऐसे में इंसान अंदर ही अंदर टूटने लगता है,
लेकिन ऊपर से मुस्कुरा देता है।

गीता यहीं कहती है —
दूसरों के फल मत देखो,
अपने कर्म पर ध्यान दो।

मेहनत कभी बेकार नहीं जाती

कई बार लगता है कि:
“इतनी मेहनत की, फिर भी कुछ नहीं हुआ।”

लेकिन सच ये है —
मेहनत कभी बेकार नहीं जाती,
वो बस तुरंत नज़र नहीं आती।

आज जो मेहनत कर रहे हो,
वही कल किसी और रास्ते से रंग दिखाएगी।

बहुत से लोग:

  • एक जगह फेल होकर
  • दूसरी जगह चमक जाते हैं

बस फर्क इतना होता है कि
कुछ लोग बीच में हार मान लेते हैं।

फल छोड़ने का मतलब क्या नहीं है?

बहुत लोग गलत समझ लेते हैं कि
“फल छोड़ दो” मतलब:

  • लापरवाही
  • मेहनत कम
  • कोशिश छोड़ देना नहीं।

फल छोड़ने का मतलब है:

  • रिज़ल्ट के डर से डरना बंद करना
  • समाज की बातें दिल पर न लेना
  • खुद को रिज़ल्ट से कमतर न समझना

असफलता से निपटने का देसी तरीका

थोड़ा रुक जाओ
हर हार के बाद तुरंत अगला फैसला मत लो।

खुद से बात करो
मोबाइल बंद करो, शांति से सोचो।

अपने कर्म को देखो
क्या मेहनत सही थी?
अगर हाँ, तो खुद पर शक मत करो।

रास्ता बदलना हार नहीं
कभी-कभी गीता यही सिखाती है।

धैर्य रखो
देसी भाषा में — सब्र रखो भाई।

कृष्ण आज क्या कहते?

अगर कृष्ण आज होते,
तो शायद कहते:

“तू मेहनत कर,
मैं रास्ता दिखा दूँगा।
लेकिन डर के कारण रुक मत जाना।”

असली जीत क्या है?

असली जीत नौकरी लगना नहीं है।
असली जीत है —
टूटकर भी खड़ा रहना।

जो इंसान हार के बाद भी:

  • मेहनत करता है
  • सीखता है
  • आगे बढ़ता है

वही असली विजेता है।

सीख (Lesson)

कर्म करो पूरी ईमानदारी से,
फल समय पर खुद चले आएगा।
और अगर देर हो भी जाए,
तो समझ लेना —
कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।


यह लेख भगवद गीता की शिक्षाओं से प्रेरित है और आधुनिक करियर संघर्षों से जोड़कर लिखा गया है।

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