अर्जुन का भ्रम: जब सही फैसला लेना मुश्किल हो जाए
ऐसे ही एक पल को महाभारत के युद्धक्षेत्र में अर्जुन ने जिया था — और वही पल आज भी हमारी ज़िंदगी से जुड़ा हुआ है।
जब अर्जुन टूट गया
कुरुक्षेत्र का मैदान तैयार था।
दोनों ओर सेनाएँ खड़ी थीं।
शंख बज चुके थे।
युद्ध बस शुरू होने ही वाला था।
अर्जुन, जो महान धनुर्धर था, जिसने अनगिनत युद्ध जीते थे,
उसी अर्जुन के हाथ काँपने लगे।
उसने अपने रथ को रोका।
चारों ओर देखा।
उसे दुश्मन नहीं दिखे…
उसे अपने अपने दिखे।
सामने उसके गुरु थे — जिन्होंने उसे धनुष चलाना सिखाया था।
सामने उसके चाचा थे — जिनकी गोद में वह खेला था।
सामने उसके मित्र और रिश्तेदार थे।
उसी क्षण अर्जुन का मन टूट गया।
उसने श्रीकृष्ण से कहा —
“मैं युद्ध नहीं कर सकता।
इन अपनों को मारकर जीत भी मिली, तो वो जीत नहीं होगी।”
यह सिर्फ अर्जुन की कहानी नहीं है
अगर ध्यान से देखें, तो अर्जुन का भ्रम आज भी ज़िंदा है —
हम सबके भीतर।
जब कोई युवा ये तय नहीं कर पाता कि:
- नौकरी करे या तैयारी जारी रखे
- परिवार की सुने या अपने सपनों की
- सच बोले या चुप रहे
तो वही अर्जुन ज़िंदा हो जाता है।
जब कोई पिता अपने बच्चों के लिए गलत समझौता करता है।
जब कोई माँ अपने सपनों को दबा देती है।
जब कोई इंसान गलत रिश्ते में फँसकर भी बाहर नहीं निकल पाता।
वो सब अर्जुन ही तो हैं।
भ्रम क्यों होता है?
अर्जुन भ्रम में इसलिए नहीं था कि वह कमज़ोर था।
वह भ्रम में इसलिए था क्योंकि वह संवेदनशील था।
भ्रम तब पैदा होता है जब:
- भावनाएँ ज़िम्मेदारी से टकराती हैं
- डर कर्तव्य पर हावी हो जाता है
- भविष्य का डर वर्तमान को जकड़ लेता है
हम अक्सर सोचते हैं —
“अगर ये फैसला गलत हो गया तो?”
“अगर लोगों को बुरा लग गया तो?”
“अगर मैं अकेला पड़ गया तो?”
और यही सोच हमें जड़ बना देती है।
कृष्ण ने अर्जुन को क्या समझाया?
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ये नहीं कहा कि भावनाएँ गलत हैं।
उन्होंने ये भी नहीं कहा कि रिश्ते बेकार हैं।
उन्होंने सिर्फ इतना कहा —
“अपने कर्तव्य से मत भागो।”
कृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि:
- हर युद्ध हथियारों से नहीं होता
- कुछ युद्ध मन के भीतर होते हैं
- और उन युद्धों से भागना सबसे बड़ी हार होती है
उन्होंने कहा —
“तुम्हारा अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं।”
मतलब:
तुम्हारा काम है सही निर्णय लेना,
पर उसका परिणाम नियंत्रित करना तुम्हारे हाथ में नहीं।
आज की ज़िंदगी में इसका मतलब
आज अर्जुन के सामने धनुष नहीं है,
उसके सामने हैं:
- EMI
- Career pressure
- Family expectations
- Social comparison
आज कृष्ण हमारे सामने रथ पर नहीं खड़े,
लेकिन उनकी सीख आज भी उतनी ही सटीक है।
जब तुम सही जानते हो,
लेकिन डर के कारण निर्णय नहीं लेते —
तब तुम भी अर्जुन की तरह युद्ध से भाग रहे होते हो।
फैसला लेना क्यों ज़रूरी है?
गलत फैसला भी कभी-कभी सही साबित हो जाता है,
लेकिन फैसला न लेना हमेशा नुकसान देता है।
अर्जुन अगर युद्ध से भाग जाता:
- अधर्म जीत जाता
- अन्याय सामान्य बन जाता और आज अगर हम सही जानते हुए भी चुप रहते हैं:
- गलत चीज़ें मज़बूत होती हैं
- हमारा आत्मविश्वास टूटता है
भ्रम से बाहर कैसे निकलें?
गीता हमें कुछ सरल लेकिन गहरे सूत्र देती है:
अपने डर को पहचानो- डर को नज़रअंदाज़ मत करो, समझो।
- जो सही है, वही करो — भले ही मुश्किल हो।
- हर चीज़ तुम्हारे नियंत्रण में नहीं।
- दूसरों को खुश करने के चक्कर में खुद को मत खोओ।
अर्जुन ने अंत में क्या किया?
अर्जुन ने धनुष उठाया।
डर के बावजूद।
भावनाओं के बावजूद।
और वही अर्जुन आगे चलकर इतिहास का हिस्सा बना।
इसका मतलब ये नहीं कि उसने कभी गलती नहीं की।
इसका मतलब ये है कि उसने भागना नहीं चुना।
आज का अर्जुन कौन है?
आज का अर्जुन:
- वो छात्र है जो डर के बावजूद मेहनत करता है
- वो कर्मचारी है जो सच बोलने का साहस करता है
- वो इंसान है जो सही रिश्ते चुनता है, भले अकेला पड़ जाए
अगर तुम भी आज किसी निर्णय में फँसे हो,
तो समझ लो —
तुम गलत नहीं हो।
तुम बस अर्जुन हो।
सीख (Lesson)
जब सही फैसला लेना मुश्किल लगे,
तो याद रखो —
भ्रम होना कमज़ोरी नहीं,
लेकिन भ्रम में फँसे रहना हार है।
यह लेख भगवद गीता की शिक्षाओं से प्रेरित है और आधुनिक जीवन की परिस्थितियों से जोड़कर लिखा गया ह