नई दिल्ली।
UGC द्वारा गठित Equity Committee का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में SC, ST और OBC समुदायों के साथ होने वाले भेदभाव को रोकना और उन्हें सुरक्षित व समान अवसर देना है। लेकिन हाल के दिनों में इस समिति का विरोध तेज़ हो गया है। सवाल यह है कि यह समिति इतनी महत्वपूर्ण क्यों है और अगर यह प्रक्रिया रुकती है तो क्या नुकसान होगा?
Equity Committee की ज़रूरत क्यों पड़ी?
UGC और सरकारी आँकड़े खुद मानते हैं कि
विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिगत भेदभाव, मानसिक उत्पीड़न और असमान व्यवहार की शिकायतें लगातार बढ़ी हैं।
कई मामलों में छात्रों की शिकायतों को
➡️नज़रअंदाज़ किया गया
➡️लंबित रखा गया
➡️या दबा दिया गया
इसी पृष्ठभूमि में Equity Committee बनाई गई, ताकि
➡️शिकायतों की समयबद्ध सुनवाई हो
➡️दोषियों की जवाबदेही तय हो
➡️और वंचित वर्गों को संवैधानिक संरक्षण मिले
विरोध क्यों हो रहा है?
विशेषज्ञों का मानना है कि
Equity Committee का विरोध वही वर्ग कर रहा है, जिसे अब तक संस्थानों में बिना जवाबदेही के सत्ता और वर्चस्व मिला हुआ था।
जब पारदर्शिता आती है,
जब निगरानी बढ़ती है,
तो असहजता स्वाभाविक है — और यही विरोध का कारण है।
अगर Equity Committee रुक गई तो क्या होगा?
अगर यह पहल रोक दी गई, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे:
➡️SC, ST और OBC छात्रों की शिकायतें फिर फाइलों में दब जाएँगी
➡️कैंपस में भेदभाव करने वालों को खुली छूट मिल जाएगी
➡️संविधान के समानता और सामाजिक न्याय के मूल सिद्धांत कमजोर पड़ेंगे
➡️देश का उच्च शिक्षा तंत्र फिर से असमान और अन्यायपूर्ण बन जाएगा
यह सिर्फ़ एक समिति नहीं, एक ज़िम्मेदारी है
Equity Committee कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं,
बल्कि संविधान द्वारा दिए गए सामाजिक न्याय के वादे को ज़मीन पर लागू करने का प्रयास है।
इसका रुकना
केवल एक समिति का रुकना नहीं होगा,
बल्कि लाखों छात्रों के अधिकार, आत्मसम्मान और भविष्य पर रोक होगी।
इसीलिए यह ज़रूरी है कि UGC की Equity Committee न सिर्फ़ जारी रहे, बल्कि और मज़बूत की जाए।