UGC की नई Equity Committee पर बवाल: जातिगत भेदभाव के ख़िलाफ़ क़दम या नया विवाद?
नई दिल्ली।
उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से गठित UGC की नई “Equity Committee” को लेकर देशभर में बहस तेज़ हो गई है। जहाँ एक ओर इसे SC, ST और OBC छात्रों के अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में अहम कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर सामान्य वर्ग के कुछ संगठन इसके विरोध में उतर आए हैं।
क्यों बनी Equity Committee?
यह समिति किसी अचानक लिए गए फैसले का नतीजा नहीं है।
रोहित वेमुला और डॉ. पायल तडवी जैसे मामलों ने देश को यह सोचने पर मजबूर किया कि विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव किस हद तक मौजूद है। इन घटनाओं के बाद चले लंबे आंदोलन और कानूनी प्रक्रिया के तहत सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर UGC को एक प्रभावी तंत्र बनाने को कहा गया था।
2026 के नए नियम क्या कहते हैं?
UGC ने फरवरी 2025 में ड्राफ्ट जारी करने के बाद 15 जनवरी 2026 को
University Grants Commission (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) Regulations, 2026 लागू किए।
इन नियमों की खास बात यह है कि:
पहली बार OBC छात्रों को भी स्पष्ट रूप से SC और ST के साथ शामिल किया गया
भेदभाव को केवल जाति तक सीमित न रखते हुए धर्म, लिंग, जन्म स्थान, विकलांगता जैसे आधारों को भी शामिल किया गया
हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में Equity Committee का गठन अनिवार्य किया गया
विरोध क्यों हो रहा है?
Equity Committee के विरोध में उतर रहे सामान्य वर्ग के संगठनों का तर्क है कि:
➡️यह व्यवस्था सामान्य वर्ग के खिलाफ है
➡️इससे झूठी शिकायतों की बाढ़ आ सकती है
➡️समिति में सामान्य वर्ग को प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया
हालाँकि विशेषज्ञों का कहना है कि विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक पदों—जैसे प्रिंसिपल और वाइस चांसलर—पर आज भी अधिकांशतः सामान्य वर्ग के लोग ही मौजूद हैं, ऐसे में यह कहना कि सामान्य वर्ग को बाहर किया गया है, पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।
समिति की संरचना क्या है?
➡️UGC के अनुसार Equity Committee में:
➡️SC, ST और OBC प्रतिनिधि
➡️महिला प्रतिनिधि
➡️दिव्यांग (PwD) प्रतिनिधि
➡️शामिल होंगे।
समिति का दायित्व होगा कि वह हर शिकायत की निष्पक्ष जाँच करे, चाहे वह किसी भी वर्ग से जुड़ी हो।
कानून के दुरुपयोग का सवाल
Equity Committee के खिलाफ सबसे बड़ा तर्क इसके दुरुपयोग की आशंका को लेकर है। इस पर सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि:
“हर कानून के दुरुपयोग की संभावना होती है, लेकिन इस डर से कानून बनाना ही बंद कर देना समाधान नहीं हो सकता।”
राजनीति भी केंद्र में
इस मुद्दे पर राजनीति भी गर्म हो गई है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि सत्तारूढ़ दल सामान्य वर्ग को साधने के लिए विरोध को खुला समर्थन दे रहा है, जबकि SC, ST और OBC समाज के बड़े हिस्से तक इस नियम की पूरी जानकारी ही नहीं पहुँच पाई है।
सवाल अब भी कायम
Equity Committee क्या वाकई उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और न्याय सुनिश्चित कर पाएगी?
या फिर यह भी अन्य नियमों की तरह विरोध और राजनीतिक खींचतान में उलझकर रह जाएगी?
फिलहाल इतना तय है कि UGC की यह पहल देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में जातिगत भेदभाव पर एक नई बहस छेड़ चुकी है—और इस बहस का असर आने वाले समय में दूर तक दिखाई देगा।
— Desh Disha News