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धार्मिक विवाद एवं कानूनी लड़ाई क्या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद वास्तव में शंकराचार्य हैं? 73 साल पुराना झगड़ा, दावा और सुप्रीम कोर्ट की अड़चन

प्रयागराज | धार्मिक विवाद

शंकराचार्य पद को लेकर नया विवाद क्यों?

माघ मेला 2026 के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर एक बार फिर शंकराचार्य पद का विवाद सामने आया है। प्रयागराज मेला प्रशासन द्वारा उनके शिविर और नामपट्ट पर “शंकराचार्य” शब्द के उपयोग पर आपत्ति जताए जाने के बाद यह मामला चर्चा में आ गया। प्रशासन का कहना है कि जब तक इस पद को लेकर कानूनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं होती, तब तक आधिकारिक तौर पर इस उपाधि का उपयोग नहीं किया जा सकता।

शंकराचार्य परंपरा का महत्व

शंकराचार्य सनातन धर्म की एक महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा से जुड़ा पद है। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख मठों के प्रमुख को शंकराचार्य कहा जाता है। यह पद केवल धार्मिक नेतृत्व का नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और दार्शनिक मार्गदर्शन का भी प्रतीक माना जाता है, इसलिए इसके उत्तराधिकार को लेकर हमेशा विशेष सावधानी और सहमति की आवश्यकता रही है।

73 साल पुराने विवाद की शुरुआत

इस विवाद की जड़ें वर्ष 1953 में जाती हैं, जब ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य ब्रह्मानंद सरस्वती के निधन के बाद उनके उत्तराधिकारी को लेकर मतभेद शुरू हुए। गुरु-शिष्य परंपरा, वसीयत और संत समाज की मान्यता को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए। समय के साथ यह मामला अदालतों तक पहुंच गया और तभी से शंकराचार्य पद को लेकर कानूनी उलझन बनी हुई है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का दावा

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने वर्ष 2022 में अपने गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद स्वयं को ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य घोषित किया। उनके समर्थकों का कहना है कि उन्हें धार्मिक परंपरा और संत समाज का समर्थन प्राप्त है, जबकि विरोधी पक्ष इस दावे को कानूनी रूप से मान्य नहीं मानता और इसे अदालत में लंबित मामलों से जोड़कर देखता है।

प्रशासन और कानून की भूमिका

माघ मेले के दौरान मेला प्रशासन ने शंकराचार्य पद के उपयोग को लेकर नोटिस जारी किया और स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट में यह मामला अभी विचाराधीन है। प्रशासन का तर्क है कि बिना स्पष्ट न्यायिक आदेश के किसी व्यक्ति को आधिकारिक रूप से शंकराचार्य मानना नियमों के खिलाफ हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामला

इस पूरे विवाद से जुड़े मामले सुप्रीम कोर्ट में अब भी लंबित हैं। अदालत के अंतिम निर्णय के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि शंकराचार्य पद पर किसका दावा वैध है। तब तक यह विवाद धार्मिक आस्था और कानूनी प्रक्रिया के बीच संतुलन की चुनौती बना रहेगा।

निष्कर्ष

वर्तमान में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का शंकराचार्य होना एक विवादित विषय है। यह मामला केवल किसी एक व्यक्ति के दावे तक सीमित नहीं, बल्कि दशकों पुरानी परंपरा, संत समाज की भूमिका और कानून के अंतिम निर्णय से जुड़ा हुआ है। जब तक सुप्रीम कोर्ट से स्पष्ट फैसला नहीं आता, तब तक यह विवाद यूं ही बना रहने की संभावना है।

Desh Disha News – Gorakhpur
Source: Online available information

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