भारत-नेपाल सीमा पर स्थित महाराजगंज जिले में इन दिनों घने कोहरे का फायदा उठाकर तस्कर सक्रिय हो गए हैं। वे कीमती लकड़ियों को आसानी से सीमा पार पहुंचा रहे हैं, जिससे वन संपदा को भारी नुकसान हो रहा है।
- महाराजगंज सीमा पर घने कोहरे के कारण तस्करी में वृद्धि।
- सागौन, शीशम जैसी कीमती लकड़ियां मुख्य निशाना।
- तस्कर नेपाल के रास्ते अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पहुंचा रहे खेप।
- सीमा सुरक्षा बल और वन विभाग के लिए निगरानी बड़ी चुनौती।
- स्थानीय समुदायों में भी तस्करी को लेकर चिंता।
महाराजगंज जिला अपनी लंबी और खुली भारत-नेपाल सीमा के लिए जाना जाता है, जो अक्सर तस्करों के लिए एक आसान रास्ता बन जाती है। इन दिनों क्षेत्र में पड़ रहा घना कोहरा, जो दृश्यता को काफी कम कर देता है, लकड़ी तस्करों के लिए एक ढाल का काम कर रहा है। वे इसी का लाभ उठाकर रात के अंधेरे और कोहरे की चादर में बेरोकटोक पेड़ों की कटाई कर रहे हैं और फिर लकड़ियों को पड़ोसी देश नेपाल में पहुंचा रहे हैं। मुख्य रूप से सागौन और शीशम जैसी उच्च मूल्य वाली लकड़ियों को निशाना बनाया जा रहा है, जिनकी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारी मांग है।
इस अवैध तस्करी का सीधा असर न केवल स्थानीय वन संपदा पर पड़ रहा है, बल्कि यह पर्यावरण संतुलन के लिए भी गंभीर खतरा है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से जहां एक ओर वन क्षेत्र सिकुड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर सरकार को राजस्व का भारी नुकसान हो रहा है। सीमा सुरक्षा बल (एसएसबी) और वन विभाग के जवान विषम मौसम परिस्थितियों में भी लगातार गश्त कर रहे हैं, लेकिन घने कोहरे के कारण उन्हें तस्करों पर नजर रखने में काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इस समस्या से निपटने के लिए आधुनिक तकनीक और स्थानीय खुफिया तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता है ताकि वन संपदा का संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।