राजधानी में चल रहे प्रतिष्ठित पुस्तक मेले के समानांतर, गेट नंबर 10 के बाहर एक अलग ही दुनिया बस गई है। यहां सड़क किनारे सजी किताबों की अस्थाई दुकानों पर पाठकों की भारी भीड़ उमड़ रही है, जो ज्ञान को किफायती दरों पर तलाश रहे हैं।
- पुस्तक मेले के बाहर गेट नंबर 10 पर सड़क किनारे लगी अस्थाई दुकानें।
- बेहद कम दामों पर विभिन्न प्रकार की किताबें उपलब्ध।
- छात्रों और आम पाठकों की भारी भीड़ देखी जा रही है।
- पुरानी और नई दोनों तरह की पुस्तकें बिक्री के लिए मौजूद।
- यह बाजार पुस्तक मेले के मुख्य आकर्षण का एक अनौपचारिक विस्तार बन गया है।
दिल्ली का पुस्तक मेला हर साल लाखों साहित्य प्रेमियों को आकर्षित करता है, जहां नवीनतम प्रकाशन और प्रतिष्ठित लेखकों की कृतियां मिलती हैं। लेकिन इस बार, मेले के भव्य प्रवेश द्वार से कुछ ही दूरी पर, गेट नंबर 10 के ठीक बाहर का नजारा कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है। यहां छोटे-छोटे स्टॉल और प्लास्टिक की चादरों पर सजी किताबों का ढेर उन पाठकों को आकर्षित कर रहा है, जिनकी जेब भले ही महंगी किताबों की इजाजत न देती हो, पर ज्ञान की भूख प्रबल है। यह दृश्य उन लाखों पाठकों के लिए किसी वरदान से कम नहीं, जो कम बजट में अपनी पसंदीदा किताबें ढूंढ रहे हैं।
सड़क किनारे लगी इन दुकानों का प्रभाव बहुआयामी है। एक ओर, यह उन छोटे विक्रेताओं के लिए आजीविका का साधन है जो पुस्तकालयों से पुरानी किताबें या अतिरिक्त स्टॉक खरीदकर यहां बेचते हैं। दूसरी ओर, यह पुस्तक मेले में आने वाले हर वर्ग के पाठक को आकर्षित करता है, विशेषकर छात्रों और शोधार्थियों को, जिन्हें अक्सर संदर्भ पुस्तकों की आवश्यकता होती है जो मुख्य मेले में महंगी मिल सकती हैं। यह अनौपचारिक बाजार न केवल किताबों तक पहुंच को लोकतांत्रिक बनाता है, बल्कि शहर की साहित्यिक संस्कृति को भी एक नया आयाम देता है, जहां औपचारिक और अनौपचारिक दोनों तरह के पठन-पाठन को बढ़ावा मिलता है।