दिल्ली के जंतर मंतर पर लद्दाख के पर्यावरण और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए प्रदर्शन का नौवां दिन है। शिक्षाविद् और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं और अब भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं। उनका यह अनशन लद्दाख के विशेष दर्जे की मांग को लेकर केंद्रित है।
- सोनम वांगचुक ने लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण की मांग को लेकर भूख हड़ताल शुरू की है।
- जंतर मंतर पर यह प्रदर्शन 20 जून से चल रहा है और आज इसका नौवां दिन है।
- उनकी मुख्य मांगों में लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करना शामिल है ताकि स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा हो सके।
- इस आंदोलन को देश भर से व्यापक जन समर्थन मिल रहा है, जिसमें विभिन्न सामाजिक संगठन भी शामिल हैं।
- वांगचुक पहले भी लद्दाख में इसी तरह के विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व कर चुके हैं, जिसमें उन्होंने पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाई है।
सोनम वांगचुक, लद्दाख के एक जाने-माने शिक्षाविद् और पर्यावरणविद् हैं, जिन्होंने क्षेत्र के अनूठे पारिस्थितिकी तंत्र और सांस्कृतिक पहचान के लिए हमेशा आवाज़ उठाई है। उनका वर्तमान विरोध भारतीय संविधान की छठी अनुसूची के तहत लद्दाख के संरक्षण की पुरानी मांगों से उपजा है, जो केंद्र शासित प्रदेश को विशेष प्रशासनिक और पर्यावरणीय सुरक्षा प्रदान करेगा। इस साल की शुरुआत में लद्दाख में एक समान, लंबे उपवास का आयोजन करने के बाद, उन्होंने राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करने के लिए अपने विरोध को दिल्ली स्थानांतरित कर दिया है, जिसमें लद्दाख के भविष्य के संबंध में केंद्र सरकार के अधूरे वादों पर जोर दिया गया है।
वांगचुक के इस अनशन ने एक बार फिर लद्दाख के संवेदनशील पर्यावरण और स्थानीय लोगों के अधिकारों पर राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है। यह आंदोलन न केवल लद्दाख के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह देश के अन्य जनजातीय क्षेत्रों के लिए भी एक मिसाल कायम कर सकता है, जो अपने अधिकारों और पहचान के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सरकार पर अब इन मांगों पर गंभीरता से विचार करने का दबाव बढ़ रहा है, क्योंकि वांगचुक का स्वास्थ्य और आंदोलन की बढ़ती लोकप्रियता इसे और मजबूत बना रही है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है और क्या लद्दाख को अपेक्षित संवैधानिक सुरक्षा मिल पाती है।