दिल्ली की रफ्तार को पंख लगाने वाला बारापुला एलिवेटेड कॉरिडोर का तीसरा चरण 11 साल बाद भी अधूरा है, जबकि इसकी लागत लगभग दोगुनी हो चुकी है। यह स्थिति तब है जब दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे जैसे बड़े प्रोजेक्ट रिकॉर्ड समय में पूरे हुए हैं, जो परियोजना प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
- बारापुला एलिवेटेड कॉरिडोर फेज-3 को पूरा होने में 11 साल का रिकॉर्ड विलंब।
- परियोजना की अनुमानित लागत 964 करोड़ से बढ़कर 1635 करोड़ रुपये तक पहुंची।
- दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे जैसा विशाल प्रोजेक्ट मात्र पांच साल में बनकर तैयार।
- बारापुला फेज-3 का लक्ष्य दक्षिण और पूर्वी दिल्ली के बीच निर्बाध कनेक्टिविटी प्रदान करना।
- देरी के कारण लाखों यात्रियों को दैनिक जाम और आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है।
बारापुला एलिवेटेड कॉरिडोर दिल्ली के सबसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में से एक है, जिसका उद्देश्य शहर के पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों के बीच यातायात को सुचारू बनाना है। इसका तीसरा चरण, जो मूल रूप से 2011 में शुरू हुआ था, को बहुत पहले ही पूरा हो जाना चाहिए था। इस विशाल विलंब के पीछे भूमि अधिग्रहण संबंधी चुनौतियां, विभिन्न सरकारी विभागों के बीच समन्वय की कमी, यूटिलिटी शिफ्टिंग में देरी और डिजाइन में बदलाव जैसे कई कारण बताए जा रहे हैं। यह परियोजना दिल्ली की लाइफलाइन मानी जाती है, जिसके पूरा होने से लाखों यात्रियों को राहत मिलने की उम्मीद है।
इस परियोजना में हुई अप्रत्याशित देरी और लागत वृद्धि का सीधा असर दिल्ली के आम नागरिकों पर पड़ रहा है। दैनिक यात्री घंटों जाम में फंसे रहते हैं, जिससे न केवल उनका समय बर्बाद होता है बल्कि ईंधन की खपत और प्रदूषण भी बढ़ता है। लागत में 671 करोड़ रुपये की वृद्धि अंततः करदाताओं के पैसे पर अतिरिक्त बोझ डालती है। वहीं, दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे का पांच साल में पूरा होना यह दर्शाता है कि इच्छाशक्ति और कुशल प्रबंधन से बड़े प्रोजेक्ट्स को भी समय पर पूरा किया जा सकता है। बारापुला-3 की यह स्थिति सरकारी परियोजनाओं के लिए बेहतर योजना, जवाबदेही और समयबद्ध निष्पादन की आवश्यकता पर जोर देती है।