पुराने लखनऊ की ऐतिहासिक मस्जिद ए कूफा से 19वीं रमजान को ग्लीम का जुलूस निकाला गया। यह जुलूस शिया समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है, जो इमाम अली अलैहिस्सलाम की शहादत की याद दिलाता है। अकीदतमंदों ने इस मौके पर नम आंखों से इमाम की कुर्बानियों को याद किया।
- ग्लीम का जुलूस पुराने लखनऊ की मस्जिद ए कूफा से शुरू हुआ।
- यह जुलूस 19वीं रमजान को इमाम अली अलैहिस्सलाम की शहादत की याद में निकाला गया।
- जुलूस में हजारों की संख्या में शिया समुदाय के अकीदतमंद शामिल हुए।
- अकीदतमंदों ने इमाम अली की कुर्बानियों को याद करते हुए मातम किया।
- जुलूस पूरी तरह से शांतिपूर्ण और व्यवस्थित ढंग से संपन्न हुआ।
ग्लीम का जुलूस शिया इस्लाम में एक अत्यंत मार्मिक और ऐतिहासिक महत्व का अनुष्ठान है। यह 19वीं रमजान को मनाया जाता है, जिस दिन इमाम अली अलैहिस्सलाम को कूफा की मस्जिद में नमाज़ के दौरान ज़ख्मी किया गया था, जिसके दो दिन बाद उनकी शहादत हुई। यह जुलूस प्रतीकात्मक रूप से इमाम अली के जनाज़े या उनकी अंतिम यात्रा का प्रतिनिधित्व करता है, जो उनके अनुयायियों के लिए उनके बलिदान और न्याय के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता को याद करने का एक तरीका है। लखनऊ, जो अपनी शिया संस्कृति और इमामबाड़ों के लिए जाना जाता है, इस दिन को विशेष श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाता है, जहाँ सदियों से यह परंपरा निभाई जा रही है।
इस ग्लीम जुलूस का स्थानीय समुदाय पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यह न केवल धार्मिक पहचान को मजबूत करता है, बल्कि समुदाय के भीतर एकजुटता और भाईचारे की भावना को भी बढ़ावा देता है। लखनऊ की गंगा-जमुनी तहजीब में ऐसे धार्मिक आयोजनों का महत्वपूर्ण स्थान है, जहाँ लोग अपनी आस्था का प्रदर्शन करते हुए भी सामाजिक सौहार्द बनाए रखते हैं। यह जुलूस युवाओं को अपनी धार्मिक विरासत से जुड़ने का अवसर प्रदान करता है और उन्हें धैर्य, बलिदान और न्याय के मूल्यों से परिचित कराता है। यह आयोजन लखनऊ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत प्रमाण है, जो पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को सहेज कर रखता है और शहर की अनूठी पहचान को बनाए रखने में मदद करता है।