देवरिया जिले में प्राथमिक शिक्षा के स्तर को उन्नत करने में ग्राम प्रधानों की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया जा रहा है। उनकी सक्रिय भागीदारी न केवल विद्यालयों के भौतिक विकास बल्कि बच्चों की उपस्थिति और सीखने के माहौल को बेहतर बनाने में भी निर्णायक साबित हो सकती है।
- ग्राम प्रधान विद्यालयों के स्थानीय संरक्षक और विकासकर्ता होते हैं।
- वे स्कूल भवनों, पेयजल और शौचालयों जैसी मूलभूत सुविधाओं को सुनिश्चित करते हैं।
- छात्रों के नामांकन और शिक्षकों की नियमित उपस्थिति पर उनकी निगरानी महत्वपूर्ण है।
- समुदाय को शिक्षा से जोड़ने और अभिभावकों को जागरूक करने में वे अहम कड़ी हैं।
- सरकारी शिक्षा योजनाओं को जमीनी स्तर पर प्रभावी बनाने में उनकी भूमिका केंद्रीय है।
देवरिया जैसे ग्रामीण प्रधान जिलों में प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता और पहुंच सुनिश्चित करना हमेशा एक बड़ी चुनौती रही है। अक्सर विद्यालयों में बुनियादी ढांचे की कमी, छात्रों की अनियमित उपस्थिति और समुदाय के कम जुड़ाव जैसी समस्याएँ देखने को मिलती हैं। ऐसे में, ग्राम प्रधान, जो सीधे स्थानीय जनता द्वारा चुने जाते हैं और अपने क्षेत्र की हर छोटी-बड़ी समस्या से भली-भांति परिचित होते हैं, वे विद्यालयों के लिए सबसे प्रभावी स्थानीय नेतृत्वकर्ता और संरक्षक साबित हो सकते हैं। उनकी सक्रियता से न केवल विद्यालयों का भौतिक ढाँचा सुधरता है, बल्कि शिक्षा का माहौल भी सकारात्मक बनता है।
ग्राम प्रधानों की सक्रिय भागीदारी से विद्यालयों में छात्रों की उपस्थिति दर में उल्लेखनीय सुधार देखा जा सकता है, जिससे ड्रॉपआउट दर में कमी आएगी। वे समुदाय और विद्यालय के बीच एक मजबूत सेतु का काम करते हुए अभिभावकों को बच्चों को नियमित रूप से स्कूल भेजने और उनकी पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, स्थानीय स्तर पर विद्यालयों से जुड़ी छोटी-मोटी समस्याओं का समाधान तुरंत हो पाता है, जिससे शिक्षा प्रक्रिया में कोई बाधा नहीं आती। भविष्य में, यदि ग्राम प्रधानों को शिक्षा संबंधी निर्णयों में और अधिक अधिकार व प्रशिक्षण दिया जाए, तो देवरिया की प्राथमिक शिक्षा में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आ सकता है, जिससे हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लाभ मिल सके।