नई दिल्ली। वैश्विक कपड़ा उद्योग में चीन और बांग्लादेश लगातार अपनी स्थिति मजबूत करते जा रहे हैं, जबकि भारत इस प्रतिस्पर्धा में अपेक्षाकृत पीछे दिखाई दे रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कपड़ा और परिधान की मांग बढ़ने के बावजूद भारत को कई आंतरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिनका सीधा असर उत्पादन, निर्यात और निवेश पर पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि टैक्स संरचना की जटिलता, लेबर कानूनों की सख्ती और बुनियादी ढांचे से जुड़ी कमियां इस उद्योग की रफ्तार को सीमित कर रही हैं।
कपड़ा उद्योग भारत की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह क्षेत्र लाखों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार प्रदान करता है और निर्यात आय का भी एक बड़ा हिस्सा इसी से आता है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में कपड़ा उद्योग आजीविका का प्रमुख साधन रहा है। इसके बावजूद, वैश्विक प्रतिस्पर्धा के इस दौर में भारत अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पा रहा है। उत्पादन लागत में बढ़ोतरी, कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी समस्याएं उद्योग के सामने बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि भारत में टैक्स प्रणाली कई स्तरों पर जटिल है, जिससे छोटे और मध्यम उद्यमों को संचालन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, लेबर कानूनों को लेकर उद्योग जगत में लंबे समय से संतुलन की मांग की जा रही है। श्रमिकों के अधिकारों की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन साथ ही उद्योग के लिए लचीलापन भी आवश्यक माना जाता है, ताकि वैश्विक मांग के अनुसार उत्पादन को तेजी से बढ़ाया या घटाया जा सके।
इसके विपरीत चीन और बांग्लादेश ने अपने कपड़ा उद्योग को निर्यात-केंद्रित नीतियों के माध्यम से विकसित किया है। चीन ने बड़े पैमाने पर आधुनिक मशीनरी, तकनीक और मजबूत सप्लाई चेन पर निवेश किया है, जिससे उत्पादन लागत नियंत्रित रहती है और समय पर आपूर्ति सुनिश्चित होती है। वहीं बांग्लादेश ने सस्ती श्रम शक्ति, सरल नियमों और निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं के जरिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी मजबूत पहचान बनाई है। इन देशों ने सरकार और उद्योग के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर फैसलों को तेजी से लागू किया है।
भारत में लॉजिस्टिक्स और इंफ्रास्ट्रक्चर की स्थिति भी एक अहम मुद्दा मानी जाती है। बंदरगाहों पर देरी, परिवहन लागत और सप्लाई चेन की धीमी प्रक्रिया निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता को प्रभावित करती है। इसके साथ ही, आधुनिक टेक्सटाइल पार्क, टेस्टिंग सुविधाओं और रिसर्च एंड डेवलपमेंट में अपेक्षित निवेश की कमी भी महसूस की जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, इन क्षेत्रों में सुधार से उत्पादन की गुणवत्ता और वैश्विक स्वीकार्यता दोनों बढ़ाई जा सकती हैं।
नीतिगत सुधारों की गति को लेकर भी सवाल उठाए जाते रहे हैं। कई योजनाएं और घोषणाएं की जाती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका प्रभाव धीरे-धीरे दिखाई देता है। उद्योग से जुड़े लोग मानते हैं कि यदि नीतियों को स्थिरता और स्पष्ट दिशा के साथ लागू किया जाए, तो निवेशकों का भरोसा बढ़ सकता है। इसके साथ ही कौशल विकास, श्रमिक प्रशिक्षण और तकनीकी उन्नयन पर ध्यान देना भी जरूरी है, ताकि भारतीय उत्पाद वैश्विक मानकों पर खरे उतर सकें।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि भारत के पास कपड़ा उद्योग में आगे बढ़ने की पूरी क्षमता मौजूद है। कच्चे माल की उपलब्धता, बड़ा घरेलू बाजार और युवा कार्यबल देश की बड़ी ताकत हैं। जरूरत इस बात की है कि टैक्स सुधारों को सरल बनाया जाए, लेबर कानूनों में संतुलन लाया जाए और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास पर निरंतर काम किया जाए। इससे न केवल निर्यात बढ़ेगा, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
कुल मिलाकर, वैश्विक कपड़ा उद्योग में भारत के सामने चुनौतियां जरूर हैं, लेकिन सही नीतिगत फैसलों, उद्योग-सरकार सहयोग और दीर्घकालिक दृष्टिकोण के साथ देश अपनी स्थिति को मजबूत कर सकता है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि भारत इन चुनौतियों से कैसे निपटता है और वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए कौन-से ठोस कदम उठाए जाते हैं।
– Desh Disha News, Gorakhpur
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