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भारत–पाकिस्तान ने परमाणु प्रतिष्ठानों की सूची का आदान-प्रदान किया, 1988 के समझौते का महत्व नई दिल्ली/इस्लामाबाद | डेस्क: देश दिशा न्यूज़

 खबर का सार:

भारत और पाकिस्तान ने एक बार फिर अपने-अपने परमाणु प्रतिष्ठानों की सूची का नियमित आदान-प्रदान किया है। यह प्रक्रिया 1988 में हुए द्विपक्षीय समझौते के तहत हर वर्ष की जाती है, जिसका उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना और परमाणु सुरक्षा से जुड़े जोखिमों को कम करना है। 

1988 का समझौता क्या है:


  • भारत और पाकिस्तान के बीच 1988 में “परमाणु प्रतिष्ठानों और सुविधाओं पर हमले न करने” से जुड़ा समझौता हुआ था।

  • इस समझौते के तहत दोनों देश हर साल 1 जनवरी को अपने परमाणु प्रतिष्ठानों की सूची साझा करते हैं।

  • समझौता 1991 में लागू हुआ और तब से यह प्रक्रिया नियमित रूप से जारी है।

सूची में क्या शामिल होता है:

  • परमाणु ऊर्जा संयंत्र

  • अनुसंधान रिएक्टर

  • ईंधन निर्माण और प्रसंस्करण से जुड़ी प्रमुख सुविधाएं
    (सूची का विवरण सार्वजनिक नहीं किया जाता)इसका उद्देश्य क्या है:

  • किसी भी तरह की गलतफहमी या आकस्मिक तनाव को रोकना

  • परमाणु प्रतिष्ठानों की सुरक्षा सुनिश्चित करना

  • विश्वास निर्माण के उपाय (Confidence Building Measures) को मजबूत करना

आधिकारिक प्रक्रिया:

  • सूची का आदान-प्रदान राजनयिक माध्यमों से किया जाता है।

  • यह कदम द्विपक्षीय समझौते के तहत एक तकनीकी और औपचारिक प्रक्रिया माना जाता है।

  • दोनों देशों ने पहले भी समय पर यह प्रक्रिया पूरी की है।

पृष्ठभूमि:
भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों में उतार-चढ़ाव के बावजूद, यह समझौता लगातार लागू है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे तंत्र क्षेत्रीय स्थिरता और जोखिम प्रबंधन में सहायक होते हैं।

निष्कर्ष:
परमाणु प्रतिष्ठानों की सूची का आदान-प्रदान एक स्थापित और नियमित प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य पारदर्शिता और सुरक्षा बनाए रखना है। यह कदम किसी तत्काल राजनीतिक बदलाव का संकेत नहीं, बल्कि समझौते के पालन का हिस्सा है।

नोट: यह समाचार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आधिकारिक जानकारी और स्थापित प्रक्रियाओं पर आधारित है।

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